Monday, July 12, 2021

*कल एक झलक ज़िंदगी को देखा,* *वो राहों पे मेरी गुनगुना रही थी,* *फिर ढूँढा उसे इधर उधर* *वो आँख मिचौली कर* *मुस्कुरा रही थी,* *एक अरसे के बाद आया मुझे क़रार,* *वो सहला के मुझे सुला रही थी* *हम दोनों क्यूँ ख़फ़ा हैं एक दूसरे से* *मैं उसे और वो मुझे समझा रही थी,* *मैंने पूछ लिया- क्यों इतना दर्द दिया* *कमबख़्त तूने,* *वो हँसी और बोली- मैं ज़िंदगी हूँ.......* _*तुझे जीना सिखा रही थी.....*💖🌹

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